अस्पताल की वो रातबारिश रुक गई, पर मैं अब भी भीग रहा हूँ – तेरी यादों की बूंदें कभी सूखती नहीं।
पापा की आखिरी साँसें अस्पताल में थीं। मैंने उनका हाथ पकड़ रखा था। उन्होंने आँखें खोलीं, मुझे देखा, और बस – सब खत्म। उस रात के बाद से मैं किसी का हाथ नहीं पकड़ पाया। डर लगता है – कहीं मेरे हाथ में ही उनकी मौत न लिखी हो।
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