माँ के हाथों का खानाअब मैं रात को रोटी सेकता हूँ, और जलाता हूँ, क्योंकि उनके बिना चूल्हा भी बेजान है। माँ, तुमने कहा था – "बड़ा होने पर समझ आएगा।" बड़ा हो गया हूँ, अब समझ आया – तुम कितनी अकेली थीं। और मैं कितना अकेला हूँ।
माँ के हाथों का खाना सिर्फ पेट नहीं भरता था – सारा ग़म हराम कर देता था। अब फ्रिज में बासी रोटी है, और मैं उसे छूकर रो लेता हूँ। काश वो एक बार और कहती – "थोड़ा और खा ले बेटा।"I am sending you this app that you may be interested.

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